अग्नि हूँ मैं

अग्नि हूँ मैं

ज्वलनशील लौ मेरी, विस्तार है तेरा |

तेरी उषा में भी प्रतिपल, प्रकाश है मेरा |
विषय -इन्द्रियों की तूनें, जो दी है आहूति,
उसकी सुगंध बनकर मैं संसार हूँ तेरा |
संयम में बांधकर यदि डालेगा
मुझमे अपनी वासना,
स्वर्ण बन जाएगी वह
जैसे कोई आराधना |
तोड़ करके यदि नियम
खुद को जला देगा,
कौन फिर विषयों की उसमें
आहुति देगा ?
कर्मयोगी तू बने यदि
आज तो फिर चल ,
संसार की इस जलन
में अग्नि बनकर जल|
प्रजवलित हो इतना कि
मार्तंड बन जाए,
लौ तेरी चंहु ओर बस प्रकाश फैलाए|
यदि अधूरे मन से
तूने की कोई कोशिश,
तब सुलगती अग्नि बस
धुआं ही बन पाए|
स्वार्थ से भरा
अगर संकल्प फेंके तू ,
अज्ञान की दुर्गन्ध बन
ये आग गल जाए |
इसलिए उठ और दहन कर
क्षीण आवाहन,
कर सके तो कर दे अब
पावक को भी पावन |


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